घनी परीक्षा
स्त्री एक बेटी है बहन है बीवी है,बहू और मां है। भाभी और ननद फिर एक सास है । दादी नानी आदि हर रिश्ते को स्नेह के साथ निभाती है क्योंकि इस में उसे खुद को ही समायोजित करना पड़ता है परंतु एक सास का रिश्ता निभाना एक चुनौती भरी परीक्षा है, इसमें समायोजन के साथ अपने आत्म सम्मान एवं संस्कारों की रक्षा करते हुए अपनी बहू के लिए भी उचित स्थान बनाने की ज़िम्मेदारी होती है। स्त्री की इसी अवस्था को ध्यान में रखते हुए निम्न पंक्तियां लिखी गई हैं।।
घनी परीक्षा
आज फिर मेरी परीक्षा ली तुमने भगवान
एक चुनौती मेरे संमुख, कैसे पाऊं मैं सम्मान।।
सब कुछ पाया तेरी कृपा से,ना किया कभी अभिमान,
कोरी गागर हाथ में रखदी,”अब बना इसे तू शान”।।
कच्ची हांडी कच्ची गागर,बिखर बिखर जाती है,
कहीं की बालू कहीं की रेता स्वभाव नहीं पाती है।।
कितने चिकने हाथ करूं मैं?,खुर्रा इस का जाए जो,
भीनी-भीनी ताप धरुं मैं,भट्टी ना बन जाए जो।।
दिल की आंच इसे साधते,सुलग सुलग जाती है,
सीने लगा के सेक लूं इसको भाव की ताप सुहाती है।।
ठंडक दूं फिर नमः आंखों से, बूंद बूंद अश्रू धारा,
तब तक थाप धरूं मैं इसपे मिट जाए मिट्टी का खारा।।
कुछ वर्षों के अनुकरण से रुप जो मेरा पाएगा,
दंग ज़माना दंग समाज आंहे भर रह जाएगा ।।
स्नेह की चादर ओढ़ के मेरी,यह घड़ा मेरा कहलाएगा,
ताक पे रख देगा यह खुर्रा, जब पूरा चिकनाएग ।।
भूल जाएगा अपनी मिट्टी,किस प्रांत की रेता है,
अस्तित्व यहां का पा जाएगा, जीवन जो यहां पे भेंटा है।।
बालू मिट्टी रेता पक के रूप जो स्वर्णिम लेता है,
जान नहीं पाओगे “तुम” भी कौन इसका खेता है ।।
शान से मस्तक उठ जाएगा,सज जाएगा मेरा सिर,
“हार” मेरा स्वभाव नहीं है,नई परीक्षा ढूंढ़ना फिर ।।
अटल विश्वास है मेरा,कि तुम को रास है मेरा,
हर अंधकार के बाजू,रखते तुम उज्जवल सवेरा ।।
वेणु venu
घनी परीक्षा
स्त्री एक बेटी है बहन है बीवी है,बहू और मां है। भाभी और ननद फिर एक सास है । दादी नानी आदि हर रिश्ते को स्नेह के साथ निभाती है क्योंकि इस में उसे खुद को ही समायोजित करना पड़ता है परंतु एक सास का रिश्ता निभाना एक चुनौती भरी परीक्षा है, इसमें समायोजन के साथ अपने आत्म सम्मान एवं संस्कारों की रक्षा करते हुए अपनी बहू के लिए भी उचित स्थान बनाने की ज़िम्मेदारी होती है। स्त्री की इसी अवस्था को ध्यान में रखते हुए निम्न पंक्तियां लिखी गई हैं।।
घनी परीक्षा
आज फिर मेरी परीक्षा ली तुमने भगवान
एक चुनौती मेरे संमुख, कैसे पाऊं मैं सम्मान।।
सब कुछ पाया तेरी कृपा से,ना किया कभी अभिमान,
कोरी गागर हाथ में रखदी,”अब बना इसे तू शान”।।
कच्ची हांडी कच्ची गागर,बिखर बिखर जाती है,
कहीं की बालू कहीं की रेता स्वभाव नहीं पाती है।।
कितने चिकने हाथ करूं मैं?,खुर्रा इस का जाए जो,
भीनी-भीनी ताप धरुं मैं,भट्टी ना बन जाए जो।।
दिल की आंच इसे साधते,सुलग सुलग जाती है,
सीने लगा के सेक लूं इसको भाव की ताप सुहाती है।।
ठंडक दूं फिर नमः आंखों से, बूंद बूंद अश्रू धारा,
तब तक थाप धरूं मैं इसपे मिट जाए मिट्टी का खारा।।
कुछ वर्षों के अनुकरण से रुप जो मेरा पाएगा,
दंग ज़माना दंग समाज आंहे भर रह जाएगा ।।
स्नेह की चादर ओढ़ के मेरी,यह घड़ा मेरा कहलाएगा,
ताक पे रख देगा यह खुर्रा, जब पूरा चिकनाएग ।।
भूल जाएगा अपनी मिट्टी,किस प्रांत की रेता है,
अस्तित्व यहां का पा जाएगा, जीवन जो यहां पे भेंटा है।।
बालू मिट्टी रेता पक के रूप जो स्वर्णिम लेता है,
जान नहीं पाओगे “तुम” भी कौन इसका खेता है ।।
शान से मस्तक उठ जाएगा,सज जाएगा मेरा सिर,
“हार” मेरा स्वभाव नहीं है,नई परीक्षा ढूंढ़ना फिर ।।
अटल विश्वास है मेरा,कि तुम को रास है मेरा,
हर अंधकार के बाजू,रखते तुम उज्जवल सवेरा ।।
वेणु venu
घनी परीक्षा
स्त्री एक बेटी है बहन है बीवी है,बहू और मां है। भाभी और ननद फिर एक सास है । दादी नानी आदि हर रिश्ते को स्नेह के साथ निभाती है क्योंकि इस में उसे खुद को ही समायोजित करना पड़ता है परंतु एक सास का रिश्ता निभाना एक चुनौती भरी परीक्षा है, इसमें समायोजन के साथ अपने आत्म सम्मान एवं संस्कारों की रक्षा करते हुए अपनी बहू के लिए भी उचित स्थान बनाने की ज़िम्मेदारी होती है। स्त्री की इसी अवस्था को ध्यान में रखते हुए निम्न पंक्तियां लिखी गई हैं।।
घनी परीक्षा
आज फिर मेरी परीक्षा ली तुमने भगवान
एक चुनौती मेरे संमुख, कैसे पाऊं मैं सम्मान।।
सब कुछ पाया तेरी कृपा से,ना किया कभी अभिमान,
कोरी गागर हाथ में रखदी,”अब बना इसे तू शान”।।
कच्ची हांडी कच्ची गागर,बिखर बिखर जाती है,
कहीं की बालू कहीं की रेता स्वभाव नहीं पाती है।।
कितने चिकने हाथ करूं मैं?,खुर्रा इस का जाए जो,
भीनी-भीनी ताप धरुं मैं,भट्टी ना बन जाए जो।।
दिल की आंच इसे साधते,सुलग सुलग जाती है,
सीने लगा के सेक लूं इसको भाव की ताप सुहाती है।।
ठंडक दूं फिर नमः आंखों से, बूंद बूंद अश्रू धारा,
तब तक थाप धरूं मैं इसपे मिट जाए मिट्टी का खारा।।
कुछ वर्षों के अनुकरण से रुप जो मेरा पाएगा,
दंग ज़माना दंग समाज आंहे भर रह जाएगा ।।
स्नेह की चादर ओढ़ के मेरी,यह घड़ा मेरा कहलाएगा,
ताक पे रख देगा यह खुर्रा, जब पूरा चिकनाएग ।।
भूल जाएगा अपनी मिट्टी,किस प्रांत की रेता है,
अस्तित्व यहां का पा जाएगा, जीवन जो यहां पे भेंटा है।।
बालू मिट्टी रेता पक के रूप जो स्वर्णिम लेता है,
जान नहीं पाओगे “तुम” भी कौन इसका खेता है ।।
शान से मस्तक उठ जाएगा,सज जाएगा मेरा सिर,
“हार” मेरा स्वभाव नहीं है,नई परीक्षा ढूंढ़ना फिर ।।
अटल विश्वास है मेरा,कि तुम को रास है मेरा,
हर अंधकार के बाजू,रखते तुम उज्जवल सवेरा ।।
वेणु venu


