यह कविता एक गृहणी के देशभक्ति के मनोभाव से संबंधित है, एवं गृहणियों के लिए देशभक्ति का संदेश है,जो उन्हें देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है।भावी पीढ़ी को अच्छे संस्कारो की शिक्षा देने का दायित्व गृहणी को देते हुए देश के उज्जवल भविष्य की कामना की है।।
देश भक्ति गृहणी की
क्या कहूं?,किससे कहूं?
ये देश भक्ति कैसे निभाऊं मैं?
ना हाथों में कोई सत्ता,ना कोई फौजी पदक,
फिर भीदेश के लिए, कुछ करने की मुझमें ललक।।
क्या कहूंगी मर मिटे है सिर्फ गृहस्थी के लिए?
दिल भरा देश प्रेम से, दिखती ना कोई झलक
खोल दूं मैं बांध सारे,बहने दूं रक्त नर्मदा?
सींच दे आंचल धरा का,पनपे देशप्रेम जिसमे सदा ।।
कैसे सम्भव है ये कार्य?मुझसम गृहणी के लिए।
छोड़े देशभक्ति की शिक्षा,कल की पीढ़ी के लिए।।
अभी ये सोच थी ऊपर(मस्तिष्क),कि भीतर से इक गूंज सी आई।
हिला गई तन- बदन मेरा,मगर ये बात मन भाई।।
ना कर छोटी विचारों की लता,तू जननी मातृभूमि की।
तूही दुर्गा, तूही काली,तू लक्ष्मी व धरोहर संस्कृति की।।
है जिम्मेदारी हिमालय सी, अदृश्य कांधों पर पड़ी।
कि देना ज्ञान पीढ़ी को, कौन प्राथमिकता है बड़ी।।
छलेगा मातृभूमि को,तो मां तेरे आड़े खड़ी।
करें जो आचरण मंदा,तो नस्लें 'मां’ की सड़ी।
अब गृहस्थी अगर 'मां'की,तो नस्लें ‘मां’ही बनाएगी।
जैसी हो ‘मेरी’ शिक्षा,सो धरती भावी पीढ़ी पाएगी।।
भरो रस देशभक्ति का,तो नस्लें दूर (विदेश) ना जाऐ।
भरो नशा जो शक्ति का,तो दुश्मन से भिड़ जाए।।
‘मां’की कोख से जन कर,मातृभूमि के काम आए।
या करदे काम कोई ऊंचा,तो ‘भारत’नाम पा जाए।।
यही उद्देश्य है मेरा,यही देशप्रेम है मेरा
कुशल आचरण व स्वभाव से हर नवयुवक लाए इक नया सवेरा।।
तो वो लाल है मातृभूमि का,
ना तेरा है,ना है मेरा।।।
वेणू venu


