
'मजबूर'
दर बदर पहर पहर,
डगर डगर शहर शहर
भटक रहे हैं नग्न पैर।
क्षुधा सिखा जो भस्म कर,
शुष्क कन्ठ में अश्रु घूँट कर ,
लू लपट झेल कर,
तपती सड़क चीर कर ,
सुर्ख पदचिह्न सडक पे छापकर ,
रक्त सिंचित शहर से नाता तोड़कर ,
भटक रहे हैं ये नग्न पैर ।
"छाती से लिपटी किलकारियाँ बिलख रहीं हैं ।
तपते अंगारों में चीखें चीख रहीं हैं ।
गम तमस मैं आशा
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