'मजबूर'
दर बदर पहर पहर,
डगर डगर शहर शहर
भटक रहे हैं नग्न पैर।
क्षुधा सिखा जो भस्म कर,
शुष्क कन्ठ में अश्रु घूँट कर ,
लू लपट झेल कर,
तपती सड़क चीर कर ,
सुर्ख पदचिह्न सडक पे छापकर ,
रक्त सिंचित शहर से नाता तोड़कर ,
भटक रहे हैं ये नग्न पैर ।
"छाती से लिपटी किलकारियाँ बिलख रहीं हैं ।
तपते अंगारों में चीखें चीख रहीं हैं ।
गम तमस मैं आशाएँ सिसक रहीं हैं ।
बूढ़े बाप की गमगीन निगाहें घर भेद रहीं हैं । "
ये रुदन तो हृदय में घर कर,
ऐ खुदा अब तो रहम कर ,
रहम कर रहम कर ।
किसी के वादे झेल कर,
किसी की चुप्पी देख कर,
किसी के हाथ ढूंढ कर,
थक गये हैं नग्न पैर।
बहुत हुआ बस कर ,
बस कर बस कर ।
जो कर स्वयं कर,
कमजोर तन भूलकर ,
शपथ कर शपथ कर ।
नील अंबर लाल कर
कुरूक्षेत्र निर्माण कर
अब कूच कर
कूच कर कूच कर ।
-वीरेश


