तिंरगे में लिपटकर आए जब पिता तो मासूम बचपन ये पूछ रहा था, खून लगी वर्दी को देखकर मेंहदी का रंग ये पूछ रहा था पूछ रहा था मां का आंचल, जो कभी छांव बना था पूछ रहे थे बाबा के दो डबडबाए नैना बुढ़ापे का मरहम ,क्यों अब घाव बना था सुना तो था कि अब ये दिल्ली बदला लेगी एक के बदले 10 सिर गिन-गिन कर बदला लेगी समस्या ये जो ज्यादा है, थोड़ी हो जाएगी 56 इंच छाती ये और चौड़ी हो जाएगी कल जब निकली शहीद की अर्थी मेरे गांव की सड़कों पर सवाल आंखों में लिए गली-मोहल्ला-चौराहा पूछ रहा था, कड़ी निंदा ही  क्या हल है इसका वतन रोता-रोता,आह भर कर ये पूछ रहा था ।   तिरंगे में लिपट कर जब आए पिता, तो मासूम बचपन ये पूछ रहा था ।