तुम्हारा चेहरा इन आँखों से, ओझल हो नहीं पाता,

मैं कितनी भी करूँ कोशिश, ये रातें सो नहीं पाता।


तुम्हे कैसे भुला दूँ मैं, तुम्ही से ये जहाँ सारा,

किसी के हो गये हो तुम, मगर मैं हो नहीं पाता।


मैं जब भी दर पे जाता हूँ, वह दादी पूछती तुमको,

ये काँपने होंठ लगते हैं, मगर मैं रो नहीं पाता।


कोई आ कर के फिर जाऐ, तो दिल में दर्द होता है,

मैं बस ख़ामोश हो जाता, किसी को खो नहीं पाता।


शैलेश मिश्र "वीर जी"