वो ममनुष्य नहीं दरिंदा ही होगा, समाज पर कालिख कहे या,      परवरिश पर गाली ।      बेआबरू होती मासूम ,   बचाव में कितना जूझी होगी।     वहशी  तो न  पिघला, छाप हैवानियत की छोडता रहा। जिंदगी से दूर जाती हुई, उम्मीदें कितनी उसकी टूटी होगी।  इस देश में फिर ना आने की   कसम खा रही होगी।        आत्मा उसकी जब तार -२  हो रही होगी।       बेसुध जमाना सुन न सका,  बंद दरवाजे में वो सिसकती रही ,    बेपरवाह समाज घोड़े बेच            ऊँघता रहा।   वो नीच मनुष्यता को शर्मशार              करता रहा।      मानवता  पर वो धब्बा,   गंगा जल से भी ना धुलेगा।   हर पल है शर्म ,गलानी ,     दुश्वार हुआ स्वयं से भी  नजरें मिलाना      जब-जब याद आती है       उसकी निश्छल हँसी ।       नजरें मिलाना