जब भी कोई मिला , तो मैंने सोचा,ये तो मुकम्मल होगा मगर जो दूर हुए थे, वो तो पुरे न थे  , ये भी अधूरा निकला। सच्चा साथी मिल जाता काश ! चाहत ये ख्वाहिशों का पुलिंदा निकला। अगर चलें यही सोच कर, तो सफर ये सुना होगा। होता नहीं कोई भी मुकम्मल, किसी में नादानियों कम, तो किसी में ज्यादा होगा। गर पढ़ें खुद को ढंग से  , तो नासमझियों का दिल में एक कोना होगा। सच कहूँ,शायद ही इस जहाँ में  , कोई मुकम्मल होगा।