क्या सुबह,क्या शाम ,
जीवन कर दिया हमारे नाम ।
आँखों के जिसके हम तारो,
खुशियाँ सारी हम पर वो वारे,
"माँ" जिसे हम पुकारे ।
हर भूल पर क्षमा करती,
पर सीख भी बड़े सिखाती ।
मायूसी में सरगम सी,
जख्मों पर मरहम है जननी ।
राह के अंगारों पर,
पलकें अपनी बिछा देती
दर्द में भी मुसकाती हुई,
एक खुशनुमा शाम है महतारी ।
डाँट में भी उसके प्यार है ,
रीणी उसका सारा संसार है।


