देख के दरींदगी का ये मंजर , काँप उठी है भीतर तक रूह । जिंदगी हो गई कुछ यूँ हैरान, कैसे बचाएँ अब मासूम बचपन । दिल मेरा चीख-चीख के रोये , आँसू भी थम ना पाए। रोम -रोम ने उस दर्द को महसूस किया , जो तुमने मर-मर के जिया जिस हैवान ने दी तुम्हें ये सजा, दर्द-ए-मौत , उसे भी मिलेगा। गुनहगार है वो इस समाज का, उस नरपिचास का लहू भी बहेगा ।