अफरा तफरी, चीख पुकार,
हर माथे पर शिकन,
और जेहन में कई सवाल ।
कितनी बार होगा भारत बंद ,
कब तक बेकाबू होंगे हालात ?
कौन है ये भीड़,ये उन्मादी,
आरक्षण के नाम पर,
जला रहे जो शहर और बस्ती ?
हक की बात करें तो शायद,
मरने वालों का भी हक,
था जीने का ?
जिन मासूमों की चिता सजी,
भीड़ में शायद कोई ,
उनका अपना न था ।
जाने कब तक स्वाहा होगी,
यूँ ही बेकसूरों की जिंदगी ?