तेरा हाथ मेहंदी से सुर्ख तो है लेकिन

गर ज़ुल्म के खून का होता तो क्या बात थी।

तेरी पेशानी पर परिवार का बोझ तो है लेकिन

गर इन्कलाबी जुनून का होता तो क्या बात थी।

तेरी आंख में लाल डोरे हैं, लपटें नहीं लेकिन

गर तेरा इश्क़ सुकून का होता तो क्या बात थी।

तेरे पांव में बेड़ियां तो हैं, मुंह में निवाला नहीं लेकिन

गर इंतजाम दो जून का होता तो क्या बात थी।



वेदान्त