रोटी रह गई

लोग नहीं रहे ।

अगर पढ़ना आता है 

तो पढ़िए

जो लिखा है रोटियों पर!

यह रोटी,रोटी नहीं है

मुकद्दर है

उन तमाम मजलूमों का

जो हिमाकत कर गए

ये सोचने कि के

जाएंगे घर एक दिन।

यह रोटी एक अहम हथियार है

नमक तेल में डुबो कर

बचे खुचे मजदूरों के

ज़ख्मों पर लगाने का 

और याद दिलाने का

कि दुनिया रोटी जैसी होती है

गोल - मोल, सूखी और बेजान।

इंसान को खून के आंसू रुलाने वाली

और जो जुर्रतन आंसू सूख गए

तो ताउम्र पटरियों पर सुलाने वाली।