तारों का घुंघट लेकर के
जब रात दिन के गालों को
ढकती है।
तब चांद अकेला जागता है।
तारों का संघ ले चलता है।
इस स्वच्छ चांदनी के घेर में
एक प्रेमी जोड़ा मिलता है ।
हाथों में हाथ ले मचलता है।
तब दुनिया सारी सो जाती है
जब तन्हाई गहराती है।
मन की कुंडी खरकती है।
मद होश हवाएं कातिल ने
खंजर मार दीवानों पर...
इस चांद सी नशीली रातों में
दमन में दाग़ लगा बैठी।
मैं अपनी सुध बिसरा बैठी...
मैं अपनी सुध बिसरा बैठी।।
वसुंधरा रजक....

