अब मेरी आँखों में उसे वो प्यार नज़र नहीं आता,

जिनमें सजे थे ज़माने के ख़्वाब, अब उनमें वो खुमार नज़र नहीं आता।

ठुकरा दिया था जिस ज़माने को महज़ उसकी ख़ातिर,

अब उन्हीं आँखों में उसे कोई अपनापन नज़र नहीं आता।

लड़ते-लड़ते इन फासलों से, अब मैं भी हार चुका हूँ,

इस अँधेरे के सिवा अब मुझे भी, कोई रास्ता नज़र नहीं आता।