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अश्क


बहते हुए अश्क़ों में भीग सा गया हूँ मैं,अब दर्द के बोझ से टूट सा गया हूँ मैं।

ऐ मंज़िलों! तुम ही थोड़ा आगे सरक आओ,तुम्हारी तरफ़ आते-आते थक सा गया हूँ मैं।"

— वासु
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