बहते हुए अश्क़ों में भीग सा गया हूँ मैं,अब दर्द के बोझ से टूट सा गया हूँ मैं।ऐ मंज़िलों! तुम ही थोड़ा आगे सरक आओ,तुम्हारी तरफ़ आते-आते थक सा गया हूँ मैं।"
बहते हुए अश्क़ों में भीग सा गया हूँ मैं,अब दर्द के बोझ से टूट सा गया हूँ मैं।
ऐ मंज़िलों! तुम ही थोड़ा आगे सरक आओ,तुम्हारी तरफ़ आते-आते थक सा गया हूँ मैं।"