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अभिव्यक्ति

वो अक्सर पूँछती है कि तुम अब क्यूँ लिख नहीं पाते, कुन्द हो गया दिमाग, या अब विचार टिक नहीं पाते??? मैं चाहकर भी अब वो शब्द नहीं चुन पाता हूँ. अलंकारो और उपमाओं से कविता नहीं बुन पाता हूँ!!! लिखते लिखते जैसे सियाही जम सी जाती है! व्यक्त नहीं कुछ होता , क़लम थम सी जाती है! वो कभी जो मुखर था अब मौन है, जो कभी लिखता था, अब कौन है??? वो वार्तिनी अब बनाऊँ तो बनाऊँ कैसे??? कागज पे सब एहसास ला
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