तुम्हारी यादें जो तुम्हारी थी,

मगर तुम्हारी तरह न‌ थी,

वो हर दिन दैनिक कार्य की तरह,

और हर वक्त हर सांस की तरह आती,

मगर जब भी आती बेइंतहा आती।

तुम्हारी यादें जो हर वक्त,

मेरे साथ रहते-रहते‌ मेरी तरह हो गयी थी,

जो जाते-जाते भी‌ मानो आधा रास्ता चलकर,

वापस लौटाने लगी हो,

ठीक उसी तरह,

जिस तरह आख़िरी मुलाक़ात के वक़्त,

मैं आधा रास्ता चलकर,

पीछे मुड़ती हूं तुम्हारे पास,

वापस लौटने के लिए,

मगर तब तक तुम जा चुके थे,

हमारे रिश्ते की तरह,

और तुम्हारी यादें ठहर गयी थी,

बनकर मेरी तरह।