प्रेम एक पंछी के समान है,
जिसको सबसे प्रिय आज़ादी होती है,
जैसे पंछी पिंजरे में,
कैद नहीं रह सकता है,
उसी तरह प्रेम भी किसी,
बंधन में कैद नहीं रह सकता।
प्रेम सारे बंधनों को तोड़ता है,
सिर्फ प्रेम पाने के लिए,
दोबारा किसी बंधन में,
बंधने के लिए नहीं।
जिस तरह पंछी की पहचान,
उसकी उड़ान से होती है,
उसी तरह प्रेम की पहचान,
उसके बढ़ने से होती है,
जो सिर्फ तभी बढ़ सकता है,
जब वो आज़ाद होगा।
क्योंकि प्रेम में सबसे प्रिय,
प्रेम नहीं आज़ादी होती है।
मगर इस आज़ादी और,
उड़ान की विशेषता से,
जानने वाला पंछी भी,
अपना दाना-पानी पाने के लिए,
ज़मीं पर आता है,
उसी तरह प्रेम को,
प्रेम पाने के लिए,
प्रेमियों को ज़मीं पर,
ही रहना होगा।
अपने बल को,
प्रेम में लाना,
स्वयं प्रेम को हराना है।


