आसमां से चांद मुझे देख रहा था,और छत पर से मैं चांद को वातावरण एकदम शांत सा था,चारों तरफ बस खामोशी थी।न आसमां में कोई शोर था,न ही धरती पर कोई हलचल थी,न चांद के आस-पास तारों की भीड़ थी और न ही मेरे आस-पास लोगों की भीड़ थी। यानि उस रात बस चांद और मैं थे। आदतन चांद को देखते-देखते मैं छत पर टहल रही थी और चांद मेरी इस बिना गंतव्य की छोटी सी यात्रा में मेरे सफ़र का साथी बन आसमां में चल रहा था। एक-दूसरे को हम इस कदर देखे जा रहे थे जैसे कभी पहले तुम और मैं एक दूसरे को एक टक लगाए, बिना पलकें झुकाएं देखते थे और वक्त का पता ही नहीं चलता था। तुम्हारे बाद, आज चांद के साथ वही एहसास मैंने साझा किया। कुछ देर बाद यह खामोशी टूटी और हमारी बातें शुरू हो गई। कुछ चांद ने मुझसे कहा और कुछ चांद से मैंने। अपनी बातों को बयां करने के लिए हमें जुबां कि ज़रूरत नहीं थी, एक दूसरे को देखते-देखते हम एक दूसरे को पढ़ना सीख गये थे और एक-दूसरे के मन की बातें भी जान रहे थे।
चांद कि उस चांदनी में जहां मैंने चांद को उस पर लिखी ग़ज़लें और नज़्में सुनाई वहीं चांद थोड़ा सा शरारती होकर लुका-छिपी का खेल खेलता है और बादलों के पीछे जाकर छिपता तो मैं बिखरे हुए गेसूओ के पीछे अपना चेहरा छिपाती।
चांद से मैंने अपनी शिकायत भी की, कि तुम्हारे करीब आते बादल मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते।उस रात चांद ने बताया कि बादल तो मेरा प्रेम है, जैसे तुम अपने प्रेमी कि बाहों में सूकून महसूस करती हो उसी तरह जब बादल भी अपनी बाहों में मुझे भरता है न तो मुझे सूकून मिलता है। इसलिए अब जब भी मैं बादलों को चांद के करीब देखती हूं न तो मुझे पता चल जाता है कि चांद बादलों कि बाहों में आराम कर रहा है तो उस रात मैं चांद से बातें करने छत पर नहीं जाती बल्कि चांद और बादल के इस शोभनीय प्रेम-मिलन को आंखो में कैद करने के साथ साथ अपने कैमरे में कैद कर लेती हूं।
