मेरी पीठ पर खड़ा है

एक महल


अट्टालिकाओं का पहाड़ है

लुभाते हैं जैसे हो यौवन के देह पर

खिले हुये हो फूल!


खंजर हृदयों में ठहरा यह भूमि पर

घर नहीं होता

नानी की खटिया नहीं होती

मचान नहीं मिलता

बस मिलता आदमियों के पीठ

जिस पर उगे हुये हो चंद्रमाएँ


आंखों का अंधा होना

यह खगोलीय प्रक्रिया मात्र घटना है

डिजिटल क्रांति की उपज

आदमी की सांसे हैं


रोटी में कीड़े का होना

पीठ पर

एक आदमी का आकस्मिक दुर्घटना है।


वरुण सिंह गौतम


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