गुमनाम पतझड़ के's image
Poetry2 min read

गुमनाम पतझड़ के

Varun Singh GautamVarun Singh Gautam January 17, 2022
Share0 Bookmarks 42318 Reads0 Likes


मै गुमनाम बन चला इस पतझड़ के

किस करीनों से कहूँ क्या गुमशुम व्यथाएँ ?

तस्वीर भी टूटी किस दर्रा में फँसी जा

खोजूँ , विकलता के किस ओर गयी उमड़


टेढ़ी – मेढ़ी लकीर भी हक नहीं लगाती चलूँ किस ओर ?

आँशू भी टुबूक – टुबूक गिर रही नयनों से धार

यह धार बह चली सब , अब ये भी सुकून नहीं

सुनसान राहों में मैं अकेला , कोई पूछें नहीं , बस अकेला


मत रोक मेरे तरंगिनि हृदय को , जानें दो , जानें दो…..

किन्तु फिर भी छोड़ चलें वों किस गति , वक्त भी गई बीत ?

वक्त बह चली धूल के गर्दिशों में नहीं मेरे कोई सहारा

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts