यह धुअ उतर रहा
वक्षस्थल के किनारे
इसका आयतन संक्षिप्त है
परिप्लव करता मेरा देह
परिदग्ध है, ध्रवीकरण होता मेरा मन
घिघियाते चादर, किसी त्रिज्या के परिधि में
समेटता मनुस्मृति के दीवार पर
बनता एक चाँद
पूरनमासी अमावस्या का परिचय देता
युगांतक होने की प्रक्रिया में
मेरा अन्त होना
युक्तिशास्त्र है
पर इस वसनार्णवा पर वसंत है
जूही की डाली पर
खिला यह फूल यह, धुअ है
जो उतर रहा
पूर्णमासी में
मैं मान लूं युगादि है ?
वरुण सिंह गौतम
28 फरवरी 2025
