कम्बख्त न वो सम्भले, न हमको सम्भालने दिया

आग लगाई उन्होंने, फिर उसमें हमें जलने दिया


उन्हें हिदायतें मिली थी, ख़ैर-ख़्वाहों से मगर

हमारे रिश्ते बिखर रहे थे, उन्होंने बिखरने दिया


जिंदगी भर का हमसफ़र, कोई और बना उनका

उन्होंने हमें तन्हा किया, और राह में भटकने दिया


उनके दिए गुलाब आज भी, मेरी उन्हीं किताबों में है

न हमने उसे देखा, और न ही दिल को बहकने दिया


मोहब्बत की सर जमी पे हमने यह भी देख जाना 

जहां मोहब्बत होनी थी, वहां हिज़्र को पलने दिया


उनकी खुशी हममें नहीं, किसी और में थी “वरून”

फिर हम बेवफ़ा बने, उन्हें उनके नाम पे सवरने दिया 


©वरून गुप्ता