उसकी आँखों से मासूमियत झलक रही थी, कुछ सवाल भी थे शायद। मुस्कुराहट से झलक रहा था अपनापन,  कुछ दर्द भी था शायद। जब छुआ था प्यार से मैंने उसे, आँखें उसकी कुछ नम भी थी शायद । गले से जब लगाया उसे, धड़कने उसकी तेज़ हुई थी शायद । हाँ शायद, क्योंकि वो आनमोल था, ओंस की एक बूँद था। सहम जाता था डर के कभी, तो कभी, परदे के पीछे से झाँक कर हँसता । कभी खुश होता,तो कभी दुखी फिर पल भर में रूआँसा हो उठता। अनगिनत भाव बदलता उसका चेहरा, हर बार यह ही सोचता, "शायद ये मुझे ले जाने आए हैं"