ये पंछी बैठ उन पेड़ों पर,

गाते और गीत सुनाते हैं।

ना वो मेरे हैं ना वो तुम्हारे हैं,

बस वो खुले आसमान में पंख फैलाते हैं।

चुग - चुग तिनका लाकर,

उन हरी - भरी घांसों का,

घोंसला अपना बनाते हैं।

ना वो मेरे हैं ना वो तुम्हारे हैं,

बस वो खुले आसमान में पंख फैलाते हैं।


कवयित्री - वर्तिका सुर्वे