कदम निशाँ मैं ढूँढ रहा हूँ.. 

किस ओर ये जाते, खोज रहा हूँ.. 

मेरा दिल भी तो खाली ही था.. 

दो पल तुम यूँ ठहर ही जाते.. 

बंजर सा दिल तब तो मेरा... 

खिल उठता इक उपवन जैसा.. 

ठहर यूँ जो तुम दो पल जाते.. 

रोज़ नये तब पुष्प यूँ खिलता.. 

जो शब्दो में मेरे यूँ मिलता... 

तुम्हें वो अर्पित मैं तब करता.. 

गाकर तेरा वंदन करता.. 

कदम निशाँ मैं ढुंढ रहा हूँ... 

किस ओर ये जाते खोज रहा हूँ...