इक शाम गुजारु तेरे संग, इक ऐसा दिन भी आ जाए

बाहों मे तेरे रहकर ही, इक ढलता सूरज दिख जाए

लहराती तेरी जुल्फों को, स्पर्श मेरा भी मिल जाए

उन मंद हवाओं में गुमसुम, इक दूजे में हम खो जाएं

इक शाम गुजारु तेरे संग, इक ऐसा दिन भी आ जाए

बिन बातों के ही,दिल की बातें इक दूजे के हम सुन जाएं

और ढलता सूरज भी तुममे, मुस्कान वो ऐसी ले आये

नदियों के कलकल के जैसे, मेरे दिल के तार यूँ बज जाएं

बस साथ तुम्हारा हो ऐसे, यादों का ताज़ वो बन जाए

और आँखो में डूबे हम ऐसे, जैसे सूरज सागर में गिर जाए

इक शाम गुजारु तेरे संग, इक ऐसा दिन भी आ जाए

बाहों मे तेरे रहकर ही, इक ढलता सूरज दिख जाए

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वारिद कुशवाहा