यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया,

आज पैरो पे अपने खड़ा हो गया।


सालो पहले तक थी जो मजबूरियां,

सामने जरूरत बनके अब खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


घूमे बचपन में हम तो शहरो-शहर,

क्या पता था की होगा एक दिन ऐसा कहर,

बोझ जिम्मेदारी का यूँ खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


देखी दिक्कत, झेली बहुत सी परेशानियां,

बदल सी गयी जीवन की, ही कहानियां,

मम्मी पापा की उम्मीदों का नजर हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


देखु बचपन में जब ग्राउंड की तरफ,

सोचूं समय ऐसा जीवन में आएगा कब,

खेले मिल जुल के एक साथ जब हम सब,

पर बोझ जिम्मेदारी का यूँ पड़ा रह गया,

यारो बचपन में ही, मैं बड़ा हो गया।


एक दिन सामने थी परीक्षा कड़ी,

रिश्ते में थी एक जिम्मेदारी, भी बड़ी,

सामने थी अर्थ की समस्या खड़ी,

थी उम्मीद जिनसे हमको बड़ी,

तोड़ उम्मीद उसने कहर कर दिया,

विकट सामंजस्य सामने खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


है जिम्मेदारी भी एक ऐसा व्यसन,

काल के मुँह से जो खीच लाये जीवन,

अब तो परिभाषा जीवन का संघर्ष हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।



उम्र के झटके में थोड़े रंगीले हुए,

सपने आंखों में थोड़े संजिले हुए,

मूल से थोड़े से थे भटके मगर,

अचानक उद्देश्य सामने खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


थोड़ी मेहनत, थोड़ी सी परीक्षा हुई,

भटकी राह खुद से सीधी सी हुई,

शिक्षा-मेहनत का अजब सा जोड़ा हो गया,

आज पैरो पे मैं अपने खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।


थी उम्मीद और शौक भी थे कई,

लेकिन राह पर जिमेदारियाँ है नई,

त्याग सपनो को अपनो के लिए,

राह पर मैं अडिग सा खड़ा हो गया,

यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया,

आज पैरो पे अपने खड़ा हो गया।।




यारो बचपन में ही मैं बड़ा हो गया।।......