ये दुनिया कितनी सुंदर थी,

चेहरे पे चमक

लबों पे मुस्कुराहट लिए 

हर आदमी मिलता था 

एक दूसरे से


फिर आयी ये महामारी

और लोगो के दिमाग में कालाबाजारी 

आंखो में क्रूरता और हृदय में धृष्टता लिए

लूटने लगा आदमी एक दूसरे को


हाय तौबा ये क्या हुआ मेरी दुनिया को

शमशान में धधकती चिताओं और

नदी में तैरती लाशों ने 

मन मस्तिष्क को चैतन्य शून्य कर दिया


हर मिनट की पेशेवरी ब्रेकिंग और

किसी अपने के खोने के खबरों से

सूखता जा रहा आंसू इन आंखो में

और सूखता जा रहा लहू जिगर का


हे ईश्वर! अब बस कर

शरीर ये शिथिल हुआ जा रहा है

और मन चैतन्य शून्य।