मैं रोना चाहता हूं

कभी कभी

जी भर के

जीवन के अनचाहे

उलझनों में उलझने के कारण


मेरा पुरुष होना

बाधक बन जाता है

रोने में

मै नही रो पाता

जोर से चिल्ला-चिल्लाकर

लेकिन मैं रोना चाहता हूं


घूंट घूंट पीना पड़ता है

अपने आंसुओ को

पानी की तरह

और कभी कभी सूख जाते है

आंसू इन आंखो में जैसे 

वो इस संसार के अपार 

वेदना और चेतना से

निर्मुक्त हो गए हो।


   - वंश/@iamvanshbahadur