गिरह है कुछ मध्य हमारे 

जो चाहकर भी टूटता नहीं है

हिज्र में तेरे बेचैन है हम

सुकून है तो वस्ल में कहीं है

ना लिखूं जब तक मैं अक्स तेरा

मेरा लिखा सिद्ध होता नहीं है।।