हवा जो बही पत्ते गुनगुनाए पानी के गीत मिट्टी महकी हवा में बहकर बहकी सी सूरज झूका देख मेघों का ताप धरा हर्षाई बिन पानी के धङकन विहीन कैसी सृष्टि भादौ की झङी सावन के सैरें वर्षा का मजा