मैं चाहती हूँ ....
मैं चाहती हूँ तुमसे सीख लूँ कश्मीरी और फूलकारी कढ़ई करना साङी/ दुपट्टे पर रंग बिरंगे धागों से रच दूँ फूल पत्ती, चिङिया, पनिहारिन और संपूर्ण प्रकृति
मैं चाहती हूँ तुमसे सीख लूँ सुंदर सुंदर से लोकगीत जो तुम अलग अलग अवसरों पर गाती थी उकेङी* पूजन पर भी तुम्हारा वो गीत कचरे/ गंदगी में भी ईश्वरीय अनुभूति करा जाता था
मैं चाहती हूँ तुमसे सीख लूँ खूबसूरत से मांडने मांडना देवी के पगलिए और चौक बनाना वो दिवासा जो गेरू से बनाती थी दीवार पर
मैं चाहती हूँ तुमसे सीख लूँ वो दंतकथाएँ जो अवसर के अनुसार तुम सुना दिया करती थी मैं बहुत कुछ चाहती हूँ सीखना वो धैर्यता, तल्लीनता, सुगढ़ता... मगर अब बहुत देर हो चुकी है तुम चलती फिरती इनसाइक्लोपीडिया थी हमने पढ़ाई की/खूब पढ़ाई की इसलिए हमने तुम्हें पढ़ा नहीं बिदाई की बेला में तुम्हारी तैयारी मैं देख रही हूँ समेटकर ले जा रही हो वो फूलकारी/ मांडना लोकगीत/ भजन और ले जा रही हो अपने साथ भारतीयता!!!


