हे चक्रपाणि,

अब तो प्रलय रोको ,

हे महाकाल,अब तो 

अपने तांडव की दिशा बदलो।

क्या शव को वहन करते करते तुम थके नहीं।

हे विरंची देव ,

जिस सृष्टि को आपने रचा था,

क्या यह वही है ।

कण-कण से त्राहि माम् की पुकार है 

कितने अपने-पराये चले गये,

कितनी माँओं की गोद खाली हो गई।

कितनी ललनाओं की माँगें सूनी हो गई 

कितनी बहन बेटियों का संबल छूट गया ।

इस अदृश्य शत्रु से हम बचे भी तो कैसे ?

बहुत हो चुका भगवन ,

अब तो अपनी रचना को नया रूप दो ।

महाभारत में पांडवों को जीत के बाद क्या मिला,

अनाथ बच्चों और विधवाओं का हृदयविदारक क्रदंन।

तुम्हारी सृष्टि भी श्री विहीन हो जायेगी, 

तब तुम्हें कौन पूजेगा ?

रोको ,अपने रथ के पहिये को ।

काल के इस क्रूर प्रहार को भगवन ।

अब अपने पांचजन्य से उद्घोष तो करो,

गहरी निशा सम काल -रात्रि , अब बीत गई।

आशा विश्वास को संजोये  

यह मानव अपलक निहार रहा है।

प्राची से स्वर्णिम सुबह की किरण का ।

एक इतंजार, बस एक इतंजार । ।