मैं पारिजात हूं ।

दिव्य पुष्प, दिव्य पेड़ ।

मेरा स्थान तो दिव्य लोक यानि इन्द्रलोक था ।

सत्यभामा के प्रबल अनुरोध ने कृष्ण को विवश कर दिया, इस धरा धाम पर लाने को, मेरी सौरभ सुषमा से सम्मोहित थी वो ,

मेरा जन्म तो सागर मंथन से हुआ था ।

दिव्य रत्नों की सहोदरा हूं मैं ।

शरद ऋतु की पावन स्वर्णिम ब्रह्मवेला में जब दुर्गा स्वस्तिवाचन होता है। मैं बिछ जाती हूं इस धरा धाम पर, ।

प्रकृति के श्रृंगार के साथ ही, देवी आगमन का शुभ संदेश वाहक ।

इस सृष्टि के तीनों देवों की प्रिया रही मैं, 

हरसिंगार की संज्ञा से विभूषित हुई ।।


शिव-शक्ति यानि प्रकृति-पुरूष के संगम से जन्मी इस पारिजात को भी बिछना पड़ा था ।

सृष्टि के सृजन में, समाज के निर्माण में, पर पदाक्रान्त होकर नहीं ।

अपने आत्म सम्मान ,कर्मठता से ग्रीवा उॅची कर नित निरंतर 

बढ़ना है । खिलना है, समाज को देना है ।


एक सशक्त पारिजात 

प्रेम हो या फूल ,अत्यधिक होने पर कुचले जाते रहे हैं ।

सावधान पारिजात , सावधान ।