वामसी हूं मैं- अर्थ है कृष्ण की मुरली

सुनी सबने तो है, पर सुनी न एक सी सबने


किसी ने ईश देखा, ब्रह्म का सुर पा लिया उसने 

किसी ने प्रेम देखा, प्रेम -रस में चिर ह्रदय पाया

किसी के नेत्र होते तृप्त, वात्सल्य से देख शिशु लीला

किसी ने सत सखा पाया, तो सारथी रूप सरमाया

किसी बैरागी से पूछो, तो कहेगा कृष्ण- दीवाना

किसी प्रणयी ने देखा, रास -रस में तृप्त तन पाया

मुझे भावों से जानो तुम,

मुझे भावों से जानो तुम, कि मैं तो कृष्ण-मुरली हूं

बजी थी कारागर में भी, महल के शत शिखर पर मैं

मनों मोती में खेली हूं ,तृप्त एक अन्न- कण से मैं

धर्म का सूर्य मैं ही हूं ,चतुरता का चरम मैं ही

सरित का वेग मै ही हूं, अनल का ज्वाल भी मैं हूं

तड़ित का शोर मैं ही हूं, विहग का गान भी मैं ही

सतीत्व की लाज मैं ही हूं, समर का ध्वंस भी मैं हूं

असत्य पे सत्य की जय मैं, सर्प का दंश भी मैं हूं

मैत्री का मैं अप्रतिम प्रतिमान, शत्रु का हूं भीषण संहार

सुर प्रथम सृजन के सुख जैसा -२,सुर अंतिम मृत्यु-अकाल मेरा

कर जोड़ खड़ी सम्मुख तेरे, सुरभित है कर रसपान मेरा|

-----------वामसी