कहलाऐं जब धर्म विरोधी
पक्षधर बदलाव के,
बन जाऐं जब सत्ताधारी
कलपुर्जे अलगाव के...
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जो सेवक बनने निकले थे,
मालिक बन कर चढ़ बैठें
सिंचन का दायित्व मिला था,
आग लगाने बढ़ बैठें..
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सड़ते-सड़ते सड़ जाए जब
सत्ताधीशों की बोली...
आलोचक को गरियाने फिर
निकले भक्तों की टोली..
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बह निकले जब क्रोध रोष
सत्ता के तत्वाधानो से,
फूट पडे़ जब जन विरोध
नित निर्गत नये विधानों से..
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निर्वाचन में सारे ही,
पर्याय वैध जब हो जाऐ,
बाहुबल और धनबल में
जनमत ही जब खो जाए..
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जब परिजन से भी ऊपर
सत्ताधीशों का मान हो,
जब तटस्थ और मुर्छित बैठा
शिक्षित का संज्ञान हो,
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सिंहासन की चर्या जब,
खो बैठे अपनी मर्यादा..
सत्ता का आलाकमान ही
हो मिथ्या का निर्माता..
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लोकहित में सही यही है,
एक समर्थन कर डालें,
अभिमानी का मान कुचल,
सत्ता-परिवर्तन कर डालें!


