कोरोना वायरस की खबरें फैलने लगी थी, घर वाले भी परेशान हो रहे थे. मेरे महानगर में रहने से उनको लगता था कि कहीं यह इंडिया में ना आ जाए और महानगर इसके सबसे पहले शिकार होंगे. पर जैसे यहां तो निश्चिंता का माहौल था. मुझे भी पेपर सबमिट करने थे. कॉलेज में भी ऐसा कुछ माहौल नहीं था. सिर्फ न्यूज़ और न्यूज़ चैनल यह सब बता रहे थे.
रोज की तरह मैं और आशु भी कैंटीन में मिले मैंने इस बारे में उससे बात की तो उसने कहा "नहीं! इतनी चिंता की कोई बात नहीं लगती है फिर जो होगा देखा जाएगा." बात आई गई हो गई,मेरे दिमाग से भी और हम लोग वापस पढ़ाई में लग गए .
कुछ दिन बाद कॉलेज प्रशासन ने डिसाइड किया कि सबको अपने-अपने घर जाना चाहिए क्योंकि सरकार को अंदेशा है कि कहीं इंडिया में ये वायरस तेजी से पैर ना पसार ले. 15 तारीख तक छुट्टियों का ऐलान हो गया, फिर भी मुझे एक-दो दिन और चाहिए था सारा सामान वगैरह जमाने के लिए पर ना जाने क्यों पिताजी बहुत घबरा रहे थे और उन्होंने 18 तारीख की ही मेरी टिकट करा दी. जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने आशु को फोन किया "आशु, मेरी टिकट तो 18 की हो चुकी है तो मुझे जाना ही होगा" आशू भी बोला "यार! मेरे यहां भी मुझे जल्दी बुला रहे हैं तो मैं भी पैकिंग वगैरह कर लेता हूं और एक-दो दिन में हम मिलते हैं." हम लोग इसे बहुत कैजुअली ले रहे थे कि 10 दिन में तो वापस आ ही जाएंगे, तो मैंने भी कहा" ठीक है! मिलते हैं जाने से पहले" और 17 तारीख की शाम को हम एक नजदीकी रेस्टोरेंट में मिले. एक दूसरे को देख कर हम दोनों झट से गले लगे और दोनों के चेहरे पर कहीं ना कहीं थोड़ी चिंता तो थी. फिर भी मैंने तसल्ली देते हुए कहा कि "आशु, हम आज 10 दिन में तो वापस आ ही जाएंगे " आशु बोला" हां यार! मुझे भी ऐसा ही लगता है कि ये ज्यादा लंबा तो नहीं चलेगा".
फिर भी हमेशा की तरह हमने अपनी फेवरेट मसाला चाय मंगवाई और साथ में ग्रिल सैंडविच. थोड़ी इधर उधर की बातें की. अचानक, पता नहीं क्यों मेरी आंखों में आंसू आ गए. आशू ने हौले से मेरा हाथ पकड़ा और कहा "फिर क्यों चिंता करती हो"? मैंने कहा “चिंता नहीं आशु, तुम्हें बहुत मिस करूंगी. इन सालों में तुमसे इतनी दूर कभी नहीं गई". वह बोला" हां यार! मुझे भी तुम्हें छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा है. काश! कि हम एक शहर में रहते तो इतनी चिंता ना होती ".
एक दूसरे से गले मिलकर, रोज बात करने का, चैटिंग का वादा लेकर हम वहां से निकले.
अगले दिन आशू, मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ने आया और हमेशा की तरह हमने अपने लबों को मिलाकर देर तक बातें की.
हम सुरक्षित अपने घर पहुंचे और एक दूसरे को मैसेज किया. न जाने क्यों मैं बहुत ज्यादा उसे मिस कर रही थी और वह भी.
पर यह क्या घर आने के 4 दिन बाद ही लॉक डाउन का ऐलान हो गया और हम दोनों को लगा कि अब क्या होगा ?
जैसे ही भाषण खत्म हुआ, मैं बाहर भागी और मैंने तुरंत उसे कॉल लगाया. उसका फोन इंगेज आ रहा था क्योंकि वह भी मुझे कॉल लगा रहा था. जब फोन मिला तो हम दोनों के मुंह से यह निकला कि "यार! अब क्या होगा? पता नहीं कितने दिन ऐसे रहने पड़ेंगे. कैसे रह पाएंगे हम दोनों?"
मेरे पास तो फिर भी जगह थी मैं इधर उधर जाकर बात कर सकती थी, पर आशु? आशु के घर का माहौल बहुत सख्त था और अब तो नीचे उतरना भी मना था. घर से बाहर नहीं जा सकते. वह बहुत ही घबरा रहा था और मैं भी. इतने दिन एक दूसरे के बिना, एक दूसरे को देखे बिना कैसे रह पाएंगे?
हमने एक तरीका निकाला. आशु ने मुझसे कहा कि "स्नैपचैट डाउनलोड कर ले ताकि हम रोज बात कर सके" मैं पूछी "कैसे? तो वह बोला " पगली! उसमें ना चैट पढ़ते ही चैट डिलीट हो जाती है। मुझे आईडिया अच्छा लगा और बोला "उसने वॉइस नोट भी भेज सकते हैं". मैंने कहा यह तो बहुत अच्छा है क्यूँकि मैं नहीं चाहती थी कि कोई भी हमारी चैट को पढ़े. इतनी जल्दी किसी को भी, घर वालों को सब पता चले. हमारे घरों में बवाल खड़ा हो जाए.
अभी हमें मीलों सफर तय करना था. दूर तक साथ रहना था और अपने अपने पैरों पर खड़ा होना था. रोज हम बातें करते, कभी एक दूसरे को फोटो भेज देते, कभी वॉइस नोट भेज देते, और अपने पुराने दिनों को याद करते.
एक दूसरे को बहुत मिस करते थे, पर जब कभी मौका मिलता तो हम लोग वीडियो कॉलिंग जरूर करते.
मम्मी को इतना पता था कि मेरा एक दोस्त है बहुत अच्छा, बस इससे ज्यादा कुछ नहीं और मैं अभी इस वक्त कुछ बताने की स्थिति में भी नहीं थी. आशु को आगे कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स में बैठने का मौका मिल सके और जब तक हम कुछ बनना जाए, हम नहीं चाहते थे कि घर वालों को पता चले और कुछ नया बखेड़ा खड़ा हो.
दुनिया में जो हो रहा था उसको लेकर हम बहुत निराश तो थे क्योंकि किसी का भी जाना कभी अच्छा नहीं होता और इस तरह बीमारी जहां हम ना एक दूसरे से पास जा सकते हैं ना छू सकते हैं. हम सोच रहे थे कि जब हम मिलेंगे तो क्या यह डिस्टेंस ही हमें भी पालन करना होगा? ऐसे तो हम नहीं रह पाएंगे.
जैसे जैसे लोग डाउन बढ़ता गया, वैसे-वैसे हम दोनों की बातचीत कम होती चली गई. उसके घर का सख्त माहौल, पिताजी का हमेशा घर पर रहना, उसका पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान देना, हम दोनों को और भी बेचैन किए जा रहा था. पर मैंने बहुत उम्मीदें नहीं पाली थी. रात में बहुत बेचैनी होती थी, मुझको नींद नहीं आती थी क्योंकि हमें बिना बात किए सोने की आदत जो ना थी. कई रातें बस ऐसे ही गुजरी, आंखों- आंखों में. धीरे-धीरे आदत होने लगी. हम इस बात से भी घबरा रहे थे कि कहीं हमें इस तरह दूरियों की आदत न पड़ जाए.
अब तक तो हम को समझ आ गया था कि यह महामारी बहुत विशाल रूप ले चुकी है और इतनी जल्दी जाने वाली नहीं है.
आशा - निराशा और अपनी यादों के गर्त में गोते खाते कभी ऊपर जाते, कभी नीचे जाते, कभी बहुत उम्मीद से बात करते, कभी थोड़े-थोड़े निराश होते, कभी साथ हंसते, तो कभी आंसू आ जाते. बस इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे और हर रोज सुबह शाम हम बस यही सोच रहे थे कि कब यह महामारी थोड़ी कम हो और हम लौटे और फिर मिले और फिर भगवान ना करें हम जिंदगी में कभी फिर और विच्छेद का सामना करना पड़े. यह दूरियां हमें हमसे दूर नहीं कर रही थी, पर एक दूसरे के और पास ले आई थी. एक दूसरे को हम ज्यादा समझने लगे थे. एक दूसरों से हम बहुत कम उम्मीदें रख रहे थे और फिर भी बहुत खुश थे.
हमे तो बस इंतजार था कि कब lockdown खुले और कब हम मिले.
बहुत याद आते थे साथ बिताए पल और वो साथ पी हुई "आख़िरी स्पेशल चाय".


