शाख से टूट कर
पत्ते कब हरे रहते हैं?
जल को छोड मीन,
कब जी पाती है?
गहरी खाइयां,
कभी न पाटी जाती हैं.
चलती पटरियां
कहाँ मिल पाती है?
टूटे सकोरे,
कहाँ जोडे जाते हैं?
गिरते तारे
न फिर आसमाँ पाते हैं
उड़ती आँधियाँ,
कब छत देती है?
दूरियां यूँ ही,
कब दूर होती है?
जो मिल जाए
जमीं हर पत्तों को
पानी हर मछली को
तो कहना ही क्या?
जीवन यूँ ही
आसां नहीं होता
जो करनी हो दूर
दूरियां
पुल एक बनाना होगा
ओर - छोर जुड़ाना होगा
चंद कदमों का
यह फासला
कशिश से
निभाना होगा...!!
© वैशाली
