कितने राजमुकुट बदले पर
हर बार मनुष्यता हार गयी
भूख गरीबी लाचारी
कितनों को ही मार गयी
समाचार ऐसे सुन कर
हृदय विदीर्ण होता है
अन्न उगाने वाला भी जब
अन्नविहीन रोता है
हे जग के पालनकर्ता
न्याय ये कैसा करते हो
जब सब हैं संतान तुम्हारी
भेद भला क्यों करते हो
कहीं है उत्सव राजसी और
कहीं क्षुधा संग्राम करे
कहीं अनवरत कठिन परिश्रम
कोई बिना थके विश्राम करे

