बाज़ुओं में तुम, मग़र तन्हा से हम, क्या कीजे वस्ल में भी गुफ्तुगू है, इतनि कम, क्या कीजे अब्र, अक्सर, प्यार बनकर ही बरसता है, पर अबकि बरसा,आंख भर भर,रोए हम,क्या कीजे जी, युं छिलने सा लगा था, बढ़ती खामोशी से बोलने पर रब्त पे लाखों सितम, क्या कीजे क्या सहर, क्या रात, आलम कैसा है, ना पूछो नींद गायब, ख़्वाइशें सारी खतम, क्या कीजे वक्त़ की, बेवक्त़ आनाकानी, इक आदत है चंद पल ख़ुशियों के ऊपर लाख़ ग़म,क्या कीजे कौन ग़ुस्सा, किस्से शिकवा, कोई है क्या अपना दुश्मनों की शक्ल पर, यारी का भ्रम, क्या कीजे जी रहे घुट घुट के कुछ इस कदर अब हम, मानो मरने की ख़्वाइश पे, मिल जाऐ रहम,क्या कीजे बस तसव्वुर थे, मुकम्मल ही भला, क्यों होते दौड़ने का ख़्वाब, माज़ूर हैं कदम, क्या कीजे क्या बताऊँ तुम्हें, कितना चिढ़ गया ये 'वैभव' ना ज़ुबां मान्ती है, ना माने कलम, क्या कीजे