साल, कहां से आते हो तुम,
नयी उमंगें कहां से लाते हो तुम,
हर बार एक साल बाद ही क्यूं आते हो तुम।
साल, तुम्हारा असली नाम क्या है,
कभी दो हज़ार बीस कभी इक्कीस,
बताओ सच क्या है।
साल, तुम वास्तव में हो भी या नहीं,
कि केवल बही खातों की दरकार हो,
या फिर एक वादा हो, नया इरादा हो।
साल, तुम निराकार हो मगर फिर भी साकार हो,
तुम आए भी हो और नहीं भी,
तुम नए भी हो पुराने भी।
साल, तुम्हारी उम्र, उम्र से भी ज्यादा है,
तुम्हारी कल्पना कल्पनातीत है,
तुम भविष्य हो, वर्तमान हो, तुम्ही अतीत हो।
साल, तुम कौन हो, कहां से आते हो?
~ वैभव सिंह


