सालों पहले किसी ने एक सपना संजोया था,
सूखी, बंजर धरती पर एक बीज बोया था।
फिर एक अंकुर फूटा था,
पिछला समय पीछे छूटा था।
नयी उमंग की लहर थी,
अपार आनंद की वो प्रहर थी।
अब काफी वक़्त बीत चुका है,
अंकुर अब फूल हुआ है।
चारों ओर सुगंधि बहार है,
सूखी, बंजर धरती का अब हरियाली से करार है।
~ वैभव सिंह


