विस्मृत कर चुका हूँ तुम्हें तुम्हारे ख़याल को नहीं आती अब तुम तुम्हारी सूरत यादाश्त में रुई जैसी नाज़ुक तुम्हारी उँगलियों की पकड़ भुला चुका हूँ मैं चोट की पपड़ियां सूख गई है बहोत सख़्त हो गया हूँ मैं...