ये हुआ क्या इस देश को,

कहीं है पत्थर कहीं भेस दो,

कहते हैं हमें हिंदुस्तानी

क्या करें हमने अपनी हार है मानी,

हम सब बने है एक मिट्टी के,

फिर क्यों करें काम हम भट्टी के,

हम ही बिगाड़े इस देश को ,

हम ही झुकाते इस देश को,

हम ही हैं गुनाहगार इस देश के,

हम ही हैं गुनाहगार अपनी माँ के,

हम ही भड़कते अपनों से,

हम ही बरसते अपनों पे,

हम हैं भारत माँ की संतानें ,

फिर भी एक दूसरे से हैं अनजाने।

हमें नहीं है हक़ अपनी माँ को सताने का ,

फिर क्यों करते काम हम रुलाने का।

हमे शर्म , न लिहाज़ है किसी चीज़ का 

बस करते काम अपनी फीस का।

अब तो समझ लो हमें, हम हैं ना कोई काम के,

बस हैं दुश्मन माँ के नाम के।

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हम ही हैं वो आग जो जलाते पूरे देश को,

फिर क्यों दें इल्ज़ाम हम इस देश के रक्षक को,

हम ही बन सकते हैं इस देश की आवाज़, 

फिर क्यों करते हैं सब को नाराज़,

कहने को तो हम युवा हैं,

पर देश को समझते हवा हैं,

जिसकी अहमियत हमें नही है पता,

फिर भी करते वही काम जो इस देश को देते डूबा।

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हम ही बनाते इस देश को ,

हम ही बिगाड़ते इस देश को ,

कहने की तो हम नेता हैं,

पर करते उसी की जो देता है।

काम है हमारा विकास,

पर करते सबको निकास,

एक चिंगारी लगाकर पहुचाते हम लोगों को जंग पे,

भई अब तो करलो कोई काम ढंग के।

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न करते पूजा न पढ़ते नमाज़ ,

क्या करें भैया हमें बस उठानी है अपनी आवाज़,

हम वो भाई हैं जो चलाते चप्पल-जूते,

जिसका मज़ा दुनिया वाले हैं लूटे।

हमारा काम है बस एक दूसरे की बुराई ,

कभी मान भी लो के हो तुम लोग भाई।

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इस देश की सुधारने के लिए खुद को सुधारो,

बड़ी -बड़ी बातें करना आसान है,

पहले अपना नक़ाब तो उतारो।

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हरा नही सकता हमें कोई अगर हम हैं साथ,

ओर क्यों सिर्फ जूते चप्पलों से बनाते बात,

किसी ने कहा है कि अहिंसा में है वो बात,

जो अच्छे अछो को मार दे लात।

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समझों प्यारे लोगो भारत माँ का पैगाम,

मत लगाओ एक दूसरे पर भड़काऊ इल्ज़ाम,

इतनी ही आस है इस माँ क़ी,

कोई न तोड़ पाए यारी हिंदुस्तान की।

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