ये दुनिया आज आक्रोश की आग में जल रही है,
जो मैंने हिम्मत थी पायी वो भी आज गल रही है,
गरीबी रोज़ बिलख-बिलख कर अपने आंसू मल रही है,
एक दूसरे को टोपी पहनकर ये दुनिया आज चल रही है,
कहना तो चाहता नहीं पर अफ़सोस इंसानियत आज मर रही है।
दिखावे की ज़िन्दगी ही आजकल चल रही है,
शेखी बटोरने की प्रथा आज आगे बढ़ रही है।
लालच ही आजकल हमारे सिर चढ़ रही है,
रोज़ एक माँ अपने बच्चे से बिछड़ रही है,
यह सही है की इंसानियत आज मर रही है।
ज़ुल्म होता देख ये दुनिया कोना पकड़ रही है,
एक बाज़ू दूसरे का गला जकड़ रही है,
सब कुछ मिला है फिर भी ये दुनिया अपने रब से झगड़ रही है,
आज इंसान की नियत बहुत बिगड़ रही है,
इसीलिए इंसानियत आज मर रही है।


