साँवले से प्रभात के हिस्से फज़र की नमाज आयी
स्याह तिमिर के दामन में चमकते सितारे जङे गये
काले तूफ़ानों को प्यारी सी वर्षा का आगोश मिला
और यहां तक कि,
साँवले कन्हैया ने भी गौर वर्ण राधा को चुना
इस पुरुष प्रधान समाज में,
या यूँ कहूँ कि इस सांवले से समाज में,
सांवले से सांवले पुरुष को भी पुरुष ही माना जाता है
कहा जाता है उन्हे,
कि रंग से भी भला कुछ होता है...
ये तो त्वचा मात्र है,
और शरीर के साथ ही मिट्टी को प्राप्त हो जाएगी
अतैव, अपने गुणों को संवारने का प्रयास करो...
उन्हें साँवले कन्हैया की संज्ञा मिलती है..."अर्थात ईश्वर तुल्य"
परंतु... परंतु... परंतु...
जब यही सांवला रंग लड़की को मिलता है
तब वो सांवली नहीं होती... वो काली हो जाती है...
और...
तब सुबह सांवली नहीं होती ... वो अशुभ होती है
तब निशा सितारे नहीं पाती... वो डरावनी होती है
तब आँधियाँ प्यारी नहीं लगती... कलमूंही होती है
और यहां तक कि,
मां काली को भी रक्तपान करते हुए भयावहता ही प्राप्य होती है
शायद...लिंग बदलते ही रंग अनश्वर भी हो जाता है
जो उनके साथ ही अन्य लोकों में विचरण को अभिशापित है
तब नहीं देखे जाते हैं,
"उसके गुण और उसका आत्मसम्मान"
तब ये रंग त्वचा मात्र नहीं रहता...
तब ये श्राप हो उठता है...
जगह जगह कुचला जाता है उसका सम्मान,
काले स्याह से तीर से...ये तीरंदाज गौर वर्ण वस्त्रों से सज्ज होते हैं
दबी सी हंसी सुनता है सांवलापन,
शादी विवाह के अवसरों पर...ये हंसी गौर वर्ण स्त्रियों की होती है
ज्यादा मेहनत करनी होती है पिता को,
दहेज के साथ उसे बेचने को...यहां ताने जननी तक के होते हैं
सबसे सुंदर लय-ताल वाले काले घुंघरूओं तक को,
सबसे पीछे की कतार दी जाती है समूह नृत्य में...
उसकी हँसी को, हल्दी कुमकुम के लेप से रौंदा जाता है
फेयर एंड लवली जैसे विज्ञापनों से,
हर मिनट में 6 बार उसके आत्मविश्वास को तोड़ा जाता है
उसकी उड़ानों को रसोइयों में सिमटा दिया जाता है
और केवल रंग की वजह से,
कुछ विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न पर काली लड़कियों का,
निर्लज्जता से... बेरहमी से...
कत्ल कर दिया जाता है साक्षात्कारों में...
मेरी तो समझ से परे है,
ये काले रंग से जोड़ दी गयी निकृष्ट संज्ञाऐं....
ना जाने किसने बुरे विचारों को काले मन की संज्ञा दी,
जबकि नैन काजल के बगैर यौवन को तरसते हैं...
ना जाने किसने काली निशा को डरावना कहा,
जबकि चांद उसी कालिख की बाहों में संवरता है...
ना जाने क्यूँ केवल मृत्यु को ही स्याह कहा गया,
जबकि सृष्टि सृजन तक बिग बैंग के काले बिन्दु से प्रमाणित है...
परंतु,
कन्हैया हो या राम...गौर वर्ण राधा और सीता ही चाहिए
मां काली को ब्याहोगे तो हलाहल धारी शिव कहलाओगे
परंतु कौन लेगा मां काली के मन की थाह...
वो भी खूबसूरत है...
वो भी तो दिल रखती है...
उसका भी तो आत्मसम्मान है...
वो भी इक मनमोहक मुस्कान स्वामिनी है...
और सबसे ऊपर...
वो भी उतनी ही श्वेत और धवल विचारप्रवाह की जननी है,
जितना कोई भी अन्य...
या शायद किसी भी अन्य से भी ज्यादा...
#Say_No_To_Racism
©उत्तम दिनोदिया
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**चित्र साभार - गूगल


