​प्रेम सुधा इक पत्नी से, जो सुत अभ्यागत पा न सके

स्वयं नारायण, उस उपवन, शहद वृक्ष खिला न सकें


कामदेव के पंचशरों से, जलते पादप का खग हो जो

मातृ स्तन भी उस चातक को, फिर घृत पिला न सकें


चंद्र सलोना उडुदल घेरे, चंद्रप्रभा बस हिय कानन में

भँवर ह्रदय को शेष अंक भी, निद्रा सुख दिला न सके


प्रेम जानकी मन में साधे, थे रघुनंदन जब जा टकराये

फिर दशकंध को, शिव शस्त्र तलक भी जिला न सके


जलद-चंचला सूर्य-किरण, अंबु के संग बसती तटिनी

अंतश हो जो सत्यवान, अंतक भी मृत्यु मिला न सके


अन्तर्मन के हरिमन पाखी, अतिंद्रिय को यूं कर साधो

अतिमंजुल रतिपति भी, प्रेम जलज को गिला न सके


​©उत्तम दिनोदिया