माफ़ करना मुझे, इस दर्द को सेह न पाया। जिस मिट्टी से आया था मैं, उस मिटटी में गया समाया।

माफ़ करना मुझे, जो ओढ़ी किसानी काया। पसीने से लथपत शरीर को अपने, इस काबिल मैं कर ना पाया।

ना दे पाया लाल को अपने, जो खिलौना गाड़ी मांगी थी। क्या करता ज़मीन थी बंजर, किस्मत ही साली बाग़ी थी।

हुई बरसात भी ना थी अब तक, उपज सूख कर आधी थी, जेब में न था एक पैसा भी, बिटिया की मंगनी बाकी थी।

तिनका तिनका गया ब्याज़ में, हाथ लगी बर्बादी थी। ब्याह में दूल्हे के ताऊ ने, एक स्कूटर फार्मा दी थी।

दो वक़्त का टुकड़ा न था, पर फितरत भी फरियादी थी। पेट काट कर हर क्षणं अपना, बच्चों की भूख मिटा दी थी।

समय अंतिम था, जमींदार द्वार पर, साँकल उसने खटका दी थी। बचा खुचा सब नोच गया वो, आनेवाली घर शादी थी।

जो था, सब अब बिक गया, पेंदे में बस लाचारी थी। न हुई पूरी फ़रमाइश, मंडप उतरन तैयारी थी।

नाक रगड़ी और पैर पड़ा मैं, पर इज़्ज़त उनको प्यारी थी। बारात उलटे रस्ते चल दी, घर में बेटी बिन ब्याही थी।

इसके बाद अब थक चुका था मैं, किस्मत कोसी सौ बारी थी। पर फसल सोने सी लहलहा उठी, कोशिश अब भी जुट जारी थी।

कुछ कौतुहल बढ़ा था घर में, कुछ भीनी किलकारी थी। फिर लगी नज़र न जाने किसकी, ये किस्मत फिर से भारी थी।

रातों रात तूफ़ान आ गया, सींच बह गयी सारी थी। ऋण तो सर पे दोगुना था अब, एक उम्मीद भी बेचारी थी।

अब है सामने लटका एक फंदा, झूलती साँसे त्यौहारी थी। झूल गया संग मैं भी अब तो, बाज़ी ये मैंने हारी थी।