कुछ शंकाओं, कुछ प्रश्नों और भावों से भर पैगाम को कल मैने इक 'ख़त' लिख डाला, अपने ही भगवान को। लिखते लिखते महसूस किया, मेरी आँखों में गीलापन है अंतस में भारी पीड़ा और मन में मेरे खालीपन है। आख़िर मैने पूछ लिया, भगवन क्यूँ ऐसा करवाते हो जब तुम ही सबके मालिक हो,तो मंदिर-मस्ज़िद क्यों लड़वाते हो। क्यूँ जात पात और भेदभाव का गूंज रहा यहाँ नारा है क्यूँ जीवन देने वाला भारत, अब कातिल है हत्यारा है। भूख बिलखता बचपन भारत का, जब हुचकी भरता है और बुढ़ापा बिना मौत के, घुट-घुट भूखों मरता है। हे भगवन! तू मुझे बता, क्यूँ बचपन रोटी को तरसे क्यूँ बंजर सूखी धरती पर, ये मेघ नही तेरे बरसे। जग को रोटी देने वाला, भूखा किसान फंदे पर है पढ़ने लिखने वाला 'छोटू',होटल के धंधे पर है। जहाँ हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा बच्चा राम था फिर भगवन!क्यूँ बनी 'दामिनी',क्यूँ राम बना शैतान था। हे भगवन!गर यही रहा, तो मत जनना इन्सान को कल मैने इक 'ख़त' लिख डाला,अपने ही भगवान को।। कल मैने इक 'ख़त'लिख डाला, अपने ही भगवान को।